उम्मीद

आई उम्मीद जैसी सूरज की किरन , जैसे हो जिंदगी का दर्पन ,
थी मेरी अपनों से थोड़ी अन-बन ,
दूर हो गयी सारी गलतफहमी ,
जिसकी वजह से थी मैं सहमी !
समाज के रिती-रिवाजों से बेड़ियों में बँधी ,
कठिनाई हो कोई भी , तूफान या आँधी ,
डट कर सामना करना मैंने है सीखा ,
पार करके हर लक्ष्मण रेखा ,
आसमान को छूना चाहती हूँ……
स्त्री हूँ मैं , इज्जत और गर्व से जिना चाहती हूँ मैं !!

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